एक प्रेमभरी कविता “वो सावन”

एक प्रेमभरी कविता "वो सावन"

एक प्रेमभरी कविता “वो सावन” दोस्तों हमारी आज कि ये पोस्ट एक इंसान के पुराने प्यारभरे दिनों को बयां करती है जब वो अपनी प्रेमिका से सावन में मिला था |

वो सावन भी क्या सावन था
जब तू पहलू में बैठा था
तब घंटो हम तुम भीगे थे
तेरा चेहरा लगा सुनहरा सा
वो सावन भी क्या सावन था
नज़रों में बस तेरी नज़रें थीं
नस-नस में बिजलियाँ दौड़ी थी
तेरी ज़ुल्फों की खुशबू से
दिल में नई सी हलचल थी
वो सावन भी क्या सावन था
तूने फिर थोड़ा सा छुआ
साँसों से उठने लगी सदा
आ गए थे तुम्हारे आगोश में
तब अपना पहला मिलन हुआ
वो सावन भी क्या सावन था
वो सावन भी क्या सावन था
एक प्रेमभरी कविता "वो सावन"
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